कभी लोग देते थे ताने और कसते थे फब्तियां लेकिन आज समाज के लिए एक मिसाल बन गई गुड़िया

Updated On: Mar 05, 2018 - 4 महीने पहले
Report By: Goodsamachar.com

कभी लोग देते थे ताने और कसते थे फब्तियां लेकिन आज समाज के लिए एक मिसाल बन गई गुड़िया

नई दिल्ली। ट्रांसजेंडर समुदाय को गलत नीयत से देखने वालों के लिए किन्नर गुड़िया एक मिसाल है। उसने वो कर दिखाया, जो सक्षम होने के बाद भी लोग नहीं करते हैं। उसने समाज की उपेक्षा के बावूजद उसी समाज को एक सीख दी है। वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने में जुटी है, ताकि बेटियों का भविष्य उज्ज्वल हो सके। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की किन्नर गुड़िया बेटी-पढ़ाओ, बेटी बचाओ अभियान को बढ़ाने के लिए तत्पर है। उसने एक लावारिस बच्ची को गोद लिया है। साथ ही अपने भाई की निःशक्त बेटी की जिंदगी संवारने का बीड़ा उठाया है। वह घर-घर जाकर शादियों या बच्चों के जन्म पर बधाई गीत नहीं गाती है। उसने अपनी मेहनत के दम पर एक पावरलूम लगवाया है। इसकी मदद से उसने चार बेरोजगारों को नौकरी भी दी है। जलीलपुर के गांव में पैदा हुई किन्नर गुड़िया आज समाज के लिए आदर्श बन गई है।

लोगों ने कसीं फब्तियां तो छोड़ दिया घर

गुड़िया बताती हैं कि मेरा जन्म एक बुनकर परिवार में हुआ है। परिवारवालों को जब मेरे किन्नर होने के बारे में पता चला तो वे काफी विचलित हो गए। उन्हें समाज का डर सताने लगा कि सब लोग क्या कहेंगे। घरवाले मुझे बाहर जाने नहीं देते थे, ताकि किसी को पता न चल जाए कि मैं किन्नर हूं। खैर, ये बात कहां छिपने वाली थी। 16 साल की उम्र में लोगों ने मुझे देखा तो मुझ पर फब्तियां कसनी शुरू कर दीं। मैं इतनी परेशान हो गई कि घर छोड़कर भाग गई। तीन साल बाद वापस लौटी तो घरवालों की मंजूरी के बाद गुरु रोशनी के साथ मंडली में बधाई गीत गाने लगी। कुछ दिन तो सब ठीक चला लेकिन जब लोगों ने मेरे शरीर के जले हुए हिस्से को देखा तो सब मेरा मजाक उड़ाने लगे। इससे काम में बाधा आने लगी और मैंने मंडली में जाना भी छोड़ दिया, ताकि मेरी वजह से किसी दूसरे की रोजी-रोटी में रुकावट न पैदा हो। दरअसल, बचपन में खान बनाने के दौरान मैं पैर से लेकर कमर तक जल गई थी। इसके बाद मैंने ट्रेनों में भीख मांगनी शुरू कर दी। मैंने अपनी और भाई की कमाई से एक घर बनवाया है और दो बेटियों की परवरिश का जिम्मा उठाया है।

बच्चों को बनाना चाहती हैं डाक्टर

गोद ली हुई लावारिस बच्ची जैनम को मैं रोज तैयार करके स्कूल पढ़ने के लिए भेजती हूं। आज के वक्त में पढ़ना बहुत जरूरी है। मैं चाहती हूं कि मेरी दोनों बेटिया जैनम और निःशक्त नरगिस पढ़-लिखकर डाक्टर बन जाएं। मुझे पढ़ाई की अहमियत मालूम है। गरीब परिवार में रहने की वजह से मैं नहीं पढ़ सकी। वहीं, मैंने घर पर एक पावरलूम लगवाया है, जिसकी मदद से मैं बुनकर का काम करती हूं। साथ ही मैंने चार लोगों को रोजगार भी दिया है। वह बताती हैं कि अब उनके जीवन का मकसद इन बच्चियों की अच्छे से परवरिश करना है। इसके अलावा, लड़कियों को शिक्षित करने के लिए गुड़िया एक स्कूल भी खोलना चाहती हैं।



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