रंग लाई थी 64 साल की महिला की मेहनत, महज 8 घंटे में इकट्ठा हो गया था 3,034 लीटर खून

Updated On: Mar 10, 2018 - 3 महीने पहले
Report By: Goodsamachar.com

रंग लाई थी 64 साल की महिला की मेहनत, महज 8 घंटे में इकट्ठा हो गया था 3,034 लीटर खून

बेंगलुरु। कहते हैं अगर आपमें हिम्मत और कुछ करने का जज्बा हो तो कोई भी कठिनाई आपका रास्ता नहीं रोक सकती। दो साल पहले एक ऐसा ही उदाहरण देखने को मिला था। बेंगलुरु के रोटरी क्लब ने कर्नाटक में 13 अलग-अलग जगहों पर 8 महज घंटे में रेकॉर्ड 3,034 लीटर खून एकत्रित करके अपना नाम इतिहास में दर्ज करा दिया था। उनके द्वारा किए गए इस कार्य को 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में जगह भी मिली। यह रिकॉर्ड इतना बड़ा है कि फिलहाल इसे तोड़ना मुश्किल है। इस पूरी पहल की दुनियाभर में तारीफ हुई, लेकिन यह सब संभव हो सका 64 साल की लता अमाशी की वजह से। लता पिछले 17 साल से लोगों की मदद कर रही हैं।

पिता से मिली प्रेरणा

लता की पैदाइश तो दिल्ली की है लेकिन उनके माता-पिता कर्नाटक से थे। लता ने बताया कि मानवता की सेवा करने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता जी से ही मिली। लता बचपन से ही लोगों की मदद करती थीं। उनकी मां और पिता दोनों समाजसेवी थे। उनके पिता संयुक्त राष्ट्र संघ में काम करते थे। अपने करियर में आगे बढ़ने के लिए लता बैंक की नौकरी करने लगीं। हालांकि बाद में उन्हें पारिवारिक वजह से यह जॉब छोड़नी पड़ गई, बाद में बेंगलुरु यूनिवर्सिटी में लेक्चरर की नौकरी करने लगीं। लता की जिंदगी यहीं से बदली और यहीं से ही लता ने गरीबों के लिए काम करने की शुरुआत की।

30,000 से ज्यादा लोगों की सर्जरी करवाई

बेंगलुरु आने से पहले वे एक अलग क्लब की सदस्य थीं। उस ग्रुप से जुड़कर वह कमजोर दृष्टि के लोगों के लिए काम करती थीं। उन्होंने आठ साल में 30,000 से भी ज्यादा गरीबों की सर्जरी करवाईं।

…जब मिल गई रक्तदान कार्यक्रम की जिम्मेदारी

लता ने बताया कि किसी की रोशनी लौटाने पर इतनी खुशी मिलती है जिसे बता पाना मुमकिन नहीं है। अभी लता रोटरी क्लब से जुड़ी हुई हैं। यह क्लब मानवता की सेवा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त है, लेकिन लता को कभी रक्तदान कार्यक्रम कराने का अनुभव नहीं था। संयोग से उन्हें इस काम की जिम्मेदारी मिल गई थी। उन्होंने भी इस जिम्मेदारी को पूरे दिल से निभाने का फैसला किया। शुरुआत में लता को यह काम थोड़ा कठिन जरूर लगा लेकिन उन्हें इस काम को सफलतापूर्वक करने का भरोसा था।

एक बच्चे की मौत से समझी अहमियत

लता ने इस प्रोग्राम से जुड़े कुछ अनुभव भी साझा किए। उन्होंने बताया कि एक बार डेंगू से पीड़ित दस साल के बच्चे को खून की जरूरत थी। लता ने उस बच्चे के लिए ब्लड का इंतजाम करवाया। इससे बच्चा बेहद खुश हुआ और वह लता को परी आंटी कहकर बुलाने लगा। उसने अपने जन्मदिन पर लता के हाथ से बना केक खाने की जिद की। उस दौरान वह आईसीयू में भर्ती था।

लता उस बच्चे के लिए केक लेकर गईं और आईसीयू में ही डॉक्टर से विशेष अनुमति लेकर केक काटा गया, लेकिन उस बच्चे की एक दिन बाद ही मौत हो गई। लड़के की मां ने लता को अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए बुलाया। मां ने लता से कहा कि उन्होंने उनके बेटे के लिए खून का इंतजाम किया है इसलिए वह भी परिवार का हिस्सा हैं। यह सुनकर लता की आंखें भर आईं और उन्होंने रक्तदान की अहमियत समझ ली। लता को इसके बाद से ही इस काम को आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिली। आज वह ब्लड डोनेशन कमिटी की प्रेसिडेंट भी हैं।



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