शाबाश अहमद ! खुद गर्दिश में जिन्दगी गुजारने वाले ने दूसरों की शिक्षा के लिए खोल दिए 9 स्कूल

Updated On: Mar 13, 2018 - 2 महीने पहले
Report By: Goodsamachar.com

शाबाश अहमद ! खुद गर्दिश में जिन्दगी गुजारने वाले ने दूसरों की शिक्षा के लिए खोल दिए 9 स्कूल

नई दिल्ली। आज भी समाज में कई लोग ऐसे हैं जिन्हें शिक्षा का असली महत्व शायद नहीं पता होता और वे इसे जिंदगी में अन्य चीजों की अपेक्षा दूसरे स्थान पर रखते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो जानते हैं कि बिना शिक्षा के एक उत्तम भारत का निर्माण और उसकी कल्पना करना दूर की कौड़ी है। इन्हीं लोगों में से ही एक हैं असम के करीमगंज के रहने वाले अहमद अली। जिन्हें उनके समय में शिक्षा तो न मिल सकी और वे परिवार का पालन पोषण करने के लिए रिक्शा चलाने को मजबूर थे लेकिन उन्होंने ठान लिया था कि जो उनके साथ हुआ वे अपने समाज की आने वाली पीढ़ी के साथ नहीं होने देंगे।

अहमद को अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी गरीबी और अभाव में गुजारनी पड़ी, क्योंकि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि वे उच्च शिक्षा ग्रहण कर अच्छी नौकरी कर सकें और समाज के उत्थान में अपना योगदान दे सकें लेकिन उनके हौसले उनके हालातों से कहीं ज्यादा बढ़कर थे। जिसकी वजह से ही उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया जिसकी मिसाल भी दी जाए तो वह उनकी प्रशंसा में कम प्रतीत होती है।

दरअसल अहमद नहीं चाहते थे कि जो उनके साथ हुआ वह समाज की आने वाली पीढ़ी और उनके परिवार के बच्चों के साथ भविष्य में हो। वे नहीं चाहते थे कि जिस तरह से उन्होंने रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पाला और अपने बचपन को जिम्मेदारी की आग में जला डाला, वह किसी अन्य के साथ न हो। इसी वजह से ही उन्होंने बेहद गरीबी में भी गुजर बसर करते हुए अब तक कुल नौ स्कूल खोले हैं और समाज को शिक्षित करने का काम कर रहे हैं।

अमहद पिछले 40 सालों में अपने इलाके में 9 स्कूलों की स्थापना कर चुके हैं और समाज के बच्चों को शिक्षित करने का कार्य कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी बेहद कीमती जमीन की भी कुर्बानी कर दी और बच्चों की पढ़ाई का प्रबंध किया। अहमद बताते हैं कि उन्होंने अपने इलाके में स्कूल खोलने के लिए अपनी एक कीमती जमीन को बेच दिया था और फिर भी धन की कमी हुई तो लोगों से सहयोग मांगा। जिसके बाद वे साल 1978 में पहला स्कूल खोलने में कामयाब हो सके।

अहमद यहीं नहीं रुके, उन्हें यह मालूम था कि इतना काफी नहीं होगा। इसके लिए वे लगातार अपने अथक प्रयासों से स्कूलों की स्थापना करते चले गए। इसके लिए उन्हें लोगों और सरकार से भी सहायता मांगनी पड़ी। वर्तमान समय में अहमद की बदौलत उनके इलाके में तीन लोवर प्राइमरी स्कूल, पांच इंग्लिश मीडियम स्कूल और एक हाई स्कूल खुल चुका है।

अहमद की इस लगन को देखते हुए वहां के स्थानीय विधायक क्रिश्नेंदु पॉल ने भी उनकी प्रशंसा की और उन्हें स्कूल खोने के लिए सरकारी की तरफ से केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय के तहत 11 लाख रुपए की सहायता भी प्रदान की गई है। अहमद बताते हैं कि उन्हें अब इस इलाके में एक कॉलेज खोलना है। उनका कहना है कि उन्हें इस काम के तहत किसी से न तो कुछ प्रलोभन चाहिए न ही किसी की प्रशंसा। वे कहते हैं कि जब उनके स्कूल के बच्चे कुछ अच्छा करते हैं या फिर कहीं नौकरी पा जाते हैं तो उन्हें सबसे ज्यादा सुकून मिलता है।

वाकई अगर अहमद जैसे कुछ लोग समाज में और हो जाएं तो वह दिन दूर नहीं है जब भारत का एक भी हिस्सा शिक्षा के अभाव की मार झेलने को मजबूर होगा। हर बच्चे को शिक्षा मिल पाएगी और भारत का समुचित विकास हो पाएगा।



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